इस दरगाह पर होती है मगरमच्छों की पूजा

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इस दरगाह पर होती है मगरमच्छों की पूजा इस दरगाह पर होती है मगरमच्छों की पूजा

मिली जानकारी के अनुसार- पाकिस्तान में ऐसा पवित्र स्थल मौजूद है, जहां लोग अपने हाथों से मगरमच्छ को खाना खिलाते हैं। सुनकर अजीब लगेगा, मगर ये हकीकत है। पाकिस्तान का छोटा सा शीदी समुदाय हर साल ख्वाजा हजरत हासन की दरगाह पर चादर चढ़ाने के साथ ही मगरमच्छों को खाना खिलाता है। मंघोपीर में तीन दिनों तक शीदी मेला चलता है। जो इसी रविवार को खत्म हुआ है। इस मेले में समुदाय के वरिष्ठ लोग ख्वाजा हजरत हासन की दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं, जिन्हें मंघोपीर के नाम से भी जाना जाता है। तालिबान के आतंक की वजह से ये मेला पिछले सात सालों से बंद था। मगर एक बार फिर मंघोपीर में ये मेला शुरू हुआ है। उससे पहले शीदी गोठ जोकि दरगाह के पास है। वहां से दरगाह तक यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में चुनरी से चेहरा ढंके सात लड़कियां हाथों में मिठाईयों की थाल लिए आगे-आगे चलती हैं। वहीं समाज के बुजुर्ग ढोल की थाप पर नीले रंग का झंडा लेकर चलते हैं। इसके बाद पूरा समाज दरगाह से सटे तालाब पर पहुंचता है और यहां रह रहे मगरमच्छों के सम्मान स्वरूप उन्हें खाना खिलाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां के मगरमच्छ ख्वाजा हजरत साहब से सीधा जुड़े हैं। समाज के बुजुर्ग बाड़े में अंदर जाते हैं और सबसे उम्र दराज मगरमच्छ, जिसका नाम मोर साहब है, उसे आवाज लगाते हैं। स्थानीय लोग इस मगरमच्छ की उम्र 127 साल मानते हैं। जैसे ही मगरमच्छ तालाब से बाहर निकलता है। बुजुर्ग उसके शरीर पर फूलों की बारिश करने के साथ ही इत्र छिड़कते हैं। वहीं मगरमच्छ पर सिंदूर भी फेंका जाता है। इसके बाद मोर साहब को लोग हाथों से खाना खिलाते हैं।

 

 

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